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Showing posts from August, 2012

आज़ाद हम आज़ाद तुम

आज़ाद हम आज़ाद तुम आज़ाद आज हमारी हर-दम एहसास नही हमको कुछ कि क्या होता आज हमारा जीवन मातृभूमि पर जान लुटाते वो वीर हिचक जाते जो पल भर , चलो आज कुछ क़र्ज़ उतारें उन वीरो को शीश नमाएं जिसने बाटी हमको ये खुशियाँ जिनका प्रेम था निर्मल निश्छल, ये नमन नही किसी एक को हो ना गाँधी ना आज़ाद को है ये नमन तो हर उस शख्श को है जिसने बख्शा हमको ये जीवन,

मेरे यार मुसाफिर.......

किस शहर से आया है तू, क्या है तेरा पता  मेरे यार मुसाफिर ज़रा ये तो बता  कहीं रस्ते में तुने देखा तो नही  दो अमरुद के पेड़, एक पानी का नल्का एक छोटी सी क्यारी से फुनगता पौधा  क्या उस मेड़ से गुजर कर आया है तू .... मेरे यार मुसाफिर ज़रा ये तो बता  देखा क्या तूने, उसी  चौखट पे बैठी इक औरत को  उसकी आँखे जैसे ढूंढ रही हो किसी को , क्या गौर किया तुने उन सुनी आँखों पर  बिछड़ने का गम जिनसे छलक रहा था रह-रह कर  , यादों की गलियां है उस शहर में,  सपने बिका करते हैं जिनमे ... क्या उन गलियों से गुजर कर आया है तू,  मेरे यार  मुसाफिर  ज़रा ये तो बता वीरानियाँ हम साया हैं, और तन्हाईयाँ इठलाती हैं व हाँ अब  उजियारी रातों में भी परछाईया घबराती है वहां अब  पर अब भी माँ ख्वाबों को संजोती है  एक दस्तक की आस में, रात भर ना सोती है  क्या उस दस्तक की गूंज सुनी है    तुने   मेंरे या...